नागरिक प्रगतिशील साहित्य
Sunday, January 22, 2017
पाब्लो नेरुदा
›
हमेशा -पाब्लो नेरुदा की कविता 'आलवेज' का अनुवाद जो भी आया मेरे सामने कभी नहीं बना रश्क का सबब तुम अपने कांधे पर एक आदमी का बोझ ल...
नजरुल इस्लाम
›
एक कविता 'नजरुल इस्लाम की' मनुष्य से घृणा करके कौन लोग कुरान, वेद, बाईबिल चूम रहे हैं ! किताबें और ग्रंथ छीन लो जबरन उनसे मनु...
अवतार सिंह पाश
›
कविता अंत में हमें पैदा नहीं होना था हमें लड़ना नहीं था हमें तो हेमकुंट पर बैठकर भक्ति करनी थी लेकिन जब सतलुज के पानी से भाप उठी जब काजी...
नज़रुल इस्लाम
›
बंगाली कवि क़ाज़ी नज़रुल इस्लाम की एक कविता हिंदू और मुसलमान दोनों ही सहनीय है लेकिन उनकी चोटी और दाढ़ी असहनीय है क्योंकि यही दोनों विवाद क...
नाजिम हिकमत
›
शिप्ली संग्रामी पाल राबसन वो हमारे गीत क्यों रोकना चाहते है शिल्पी संग्रामी पाल राबसन | हम अपनी आवाज उठा रहे है वो नाराज क्यों वो नाराज ...
गोरख पाण्डेय की कविता कुर्सीनामा
›
गोरख पाण्डेय की कविता कुर्सीनामा 1 जब तक वह ज़मीन पर था कुर्सी बुरी थी जा बैठा जब कुर्सी पर वह ज़मीन बुरी हो गई। 2 उसकी नज़र कुर्सी ...
दो मशहूर शायरों के अपने-अपने अंदाज…
›
पहले मिर्ज़ा गालिब :- *“उड़ने दे इन परिंदों को आज़ाद फिजां में ‘गालिब’* *जो तेरे अपने होंगे वो लौट आएँगे…”* शायर इकबाल का उत्तर :- ...
‹
›
Home
View web version